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आदि पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
य एष मत्तर्षभतुल्यगामी; महद्धनुः कर्षति तालमात्रम् |  १८   क
एषोऽर्जुनो नात्र विचार्यमस्ति; यद्यस्मि सङ्कर्षण वासुदेवः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति