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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र ते पुरुषव्याघ्राः परमं शौचमास्थिताः |  १   क
षड्रात्रमवसन्वीरा धनञ्जय़दिदृक्षय़ा |  १   ख
तस्मिन्विहरमाणाश्च रममाणाश्च पाण्डवाः ||  १   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति