वन पर्व  अध्याय १४६

वैशम्पाय़न उवाच

वातं तमेवाभिमुखो यतस्तत्पुष्पमागतम् |  १४   क
आजिहीर्षुर्जगामाशु स पुष्पाण्यपराण्यपि ||  १४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति