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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
रुक्मपृष्ठं धनुर्गृह्य शरांश्चाशीविषोपमान् |  १५   क
मृगराडिव सङ्क्रुद्धः प्रभिन्न इव कुञ्जरः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति