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शल्य पर्व
अध्याय १५
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सञ्जय़ उवाच
योत्स्येऽहं मातुलेनाद्य क्षत्रधर्मेण पार्थिवाः |  २२   क
स्वय़ं समभिसन्धाय़ विजय़ाय़ेतराय़ वा ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति