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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
स तं द्रुमलतागुल्मच्छन्नं नीलशिलातलम् |  १७   क
गिरिं चचारारिहरः किंनराचरितं शुभम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति