वन पर्व  अध्याय १४६

वैशम्पाय़न उवाच

ह्रिय़माणश्रमः पित्रा सम्प्रहृष्टतनूरुहः |  २२   क
पितुः संस्पर्शशीतेन गन्धमादनवाय़ुना ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति