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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रिय़पार्श्वोपविष्टाभिर्व्यावृत्ताभिर्विचेष्टितैः |  ३२   क
यक्षगन्धर्वय़ोषाभिरदृश्याभिर्निरीक्षितः ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति