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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
नवावतारं रूपस्य विक्रीणन्निव पाण्डवः |  ३३   क
चचार रमणीय़ेषु गन्धमादनसानुषु ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति