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वन पर्व
अध्याय १८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रवेशः केन दत्तोऽय़मनय़ोर्वैन्यसंसदि |  १७   क
उच्चैः समभिभाषन्तौ केन कार्येण विष्ठितौ ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति