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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं नु कुसुमावाप्तिः स्याच्छीघ्रमिति चिन्तय़न् |  ३७   क
प्रतस्थे नरशार्दूलः पक्षिराडिव वेगितः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति