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कर्ण पर्व
अध्याय १२
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सञ्जय़ उवाच
ते गाण्डीवप्रणुदिता नानारूपाः पतत्रिणः |  ३८   क
क्रोशे साग्रे स्थितान्घ्नन्ति द्विपांश्च पुरुषान्रणे ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति