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वन पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा वदति वार्ष्णेय़े धर्मराजे च भारत |  ३९   क
अथ पश्चात्तपोवृद्धो वहुवर्षसहस्रधृक् |  ३९   ख
प्रत्यदृष्यत धर्मात्मा मार्कण्डेय़ो महातपाः ||  ३९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति