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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
सरांसि च विचित्राणि प्रसन्नसलिलानि च |  ४   क
कमलैः सोत्पलैस्तत्र भ्राजमानानि सर्वशः |  ४   ख
पश्यन्तश्चारुरूपाणि रेमिरे तत्र पाण्डवाः ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति