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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य शव्देन घोरेण धनुर्घोषेण चाभिभो |  ४१   क
त्रस्तानि मृगय़ूथानि समन्ताद्विप्रदुद्रुवुः ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति