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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाय़ुसुतः क्रोधात्स्ववाहुवलमाश्रितः |  ४७   क
गजेनाघ्नन्गजं भीमः सिंहं सिंहेन चाभिभूः |  ४७   ख
तलप्रहारैरन्यांश्च व्यहनत्पाण्डवो वली ||  ४७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति