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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
उभय़ोः सेनय़ोर्मध्ये नराश्वद्विपवाहिनी |  ४७   क
यथा वैतरणी राजन्यमराष्ट्रपुरं प्रति ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति