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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
तं शव्दं सहसा श्रुत्वा मृगपक्षिसमीरितम् |  ५१   क
जलार्द्रपक्षा विहगाः समुत्पेतुः सहस्रशः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति