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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
काञ्चनैः कदलीषण्डैर्मन्दमारुतकम्पितैः |  ५३   क
वीज्यमानमिवाक्षोभ्यं तीरान्तरविसर्पिभिः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति