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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
स लाङ्गूलरवस्तस्य मत्तवारणनिस्वनम् |  ६२   क
अन्तर्धाय़ विचित्रेषु चचार गिरिसानुषु ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति