वन पर्व  अध्याय २९४

वैशम्पाय़न उवाच

कुण्डले मे प्रय़च्छस्व वर्म चैव शरीरजम् |  २३   क
गृहाण कर्ण शक्तिं त्वमनेन समय़ेन मे ||  २३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति