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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
स्मितेनाभाष्य कौन्तेय़ं वानरो नरमव्रवीत् |  ७४   क
किमर्थं सरुजस्तेऽहं सुखसुप्तः प्रवोधितः ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति