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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
अतः परमगम्योऽय़ं पर्वतः सुदुरारुहः |  ७९   क
विना सिद्धगतिं वीर गतिरत्र न विद्यते ||  ७९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति