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वन पर्व
अध्याय १४६
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वैशम्पाय़न उवाच
कारुण्यात्सौहृदाच्चैव वारय़े त्वां महावल |  ८०   क
नातः परं त्वय़ा शक्यं गन्तुमाश्वसिहि प्रभो ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति