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उद्योग पर्व
अध्याय १२२
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वैशम्पाय़न उवाच
मद्द्वितीय़ं पुनः पार्थं कः प्रार्थय़ितुमर्हति |  ५५   क
युद्धे प्रतीपमाय़ान्तमपि साक्षात्पुरन्दरः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति