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भीष्म पर्व
अध्याय १८
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सञ्जय़ उवाच
द्वादशैते जनपदाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः |  १४   क
महता रथवंशेन तेऽभ्यरक्षन्पितामहम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति