उद्योग पर्व  अध्याय १४६

वासुदेव उवाच

विररामैवमुक्त्वा तु विदुरो दीनमानसः |  २६   क
प्रध्याय़मानः स तदा निःश्वसंश्च पुनः पुनः ||  २६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति