उद्योग पर्व  अध्याय १४६

वासुदेव उवाच

अनुज्ञय़ा चाथ महाव्रतस्य; व्रूय़ान्नृपो यद्विदुरस्तथैव |  ३४   क
कार्यं भवेत्तत्सुहृद्भिर्निय़ुज्य; धर्मं पुरस्कृत्य सुदीर्घकालम् ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति