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वन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषां स मार्गान्विविधान्महात्मा; निहत्य शस्त्राणि च शात्रवाणाम् |  १८   क
यथाप्रवीरान्निजघान वीरः; परःशतान्पुष्करिणीसमीपे ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति