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भीष्म पर्व
अध्याय १५
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धृतराष्ट्र उवाच
कृपे संनिहिते तत्र भरद्वाजात्मजे तथा |  १८   क
भीष्मः प्रहरतां श्रेष्ठः कथं स निधनं गतः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति