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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
ततः समभवद्युद्धमाकुलं भरतर्षभ |  १७   क
पाञ्चालानां च सर्वेषां भारतानां च दारुणम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति