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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽस्य वाहान्समरे शरैर्निन्ये यमक्षय़म् |  १९   क
सारथिं च रथात्तूर्णं पातय़ामास पत्रिणा ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति