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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
शकुनिश्चार्जुनं राजन्परिवार्य समन्ततः |  २५   क
रथैरनेकसाहस्रैर्गजैश्चैव सहस्रशः |  २५   ख
तथा हय़सहस्रैश्च तुमुलं सर्वतोऽकरोत् ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति