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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
अर्जुनस्तु द्रुतं गत्वा शकुनेर्धनुराच्छिनत् |  ३४   क
निन्ये च चतुरो वाहान्यमस्य सदनं प्रति ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति