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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
अनिलेन यथाभ्राणि विच्छिन्नानि समन्ततः |  ३८   क
विच्छिन्नानि तथा राजन्वलान्यासन्विशां पते ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति