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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणं विद्ध्वा त्रिभिः शरैः |  ४२   क
चिच्छेद धनुषस्तूर्णं ज्यां शरेण शितेन ह ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति