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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
धृष्टद्युम्नं ततो द्रोणो विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः |  ४४   क
सारथिं पञ्चभिर्वाणै राजन्विव्याध संय़ुगे ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति