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द्रोण पर्व
अध्याय १४६
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सञ्जय़ उवाच
पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च मदोत्कटाः |  ५१   क
तथा द्रोणस्य शूरस्य द्रौणेश्चैव विशां पते ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति