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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
सूर्ये चक्षुः समाधाय़ प्रसन्नं सलिले मनः |  १८   क
ध्याय़न्महोपनिषदं योगय़ुक्तोऽभवन्मुनिः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति