आदि पर्व  अध्याय १४७

वैशम्पाय़न उवाच

त्वय़ि त्वरोगे निर्मुक्ते क्लेशादस्मात्सवान्धवे |  १८   क
अमृते वसती लोके भविष्यामि सुखान्विता ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति