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आदि पर्व
अध्याय १४७
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स तृणमादाय़ प्रहृष्टः पुनरव्रवीत् |  २२   क
अनेन तं हनिष्यामि राक्षसं पुरुषादकम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति