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शान्ति पर्व
अध्याय १४७
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शौनक उवाच
न चोपलभते तत्र न च कार्याणि पश्यति |  १२   क
निर्विण्णात्मा परोक्षो वा धिक्कृतः सर्वसाधुषु ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति