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शान्ति पर्व
अध्याय १४७
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जनमेजय़ उवाच
अनुतप्ये च पापेन न चाधर्मं चराम्यहम् |  १५   क
वुभूषुं भजमानं च प्रतिवाञ्छामि शौनक ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति