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द्रोण पर्व
अध्याय १०२
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सञ्जय़ उवाच
यदि ते सोऽनुजः कृष्णः प्रविष्टोऽनुमते मम |  ८१   क
अनीकं न तु शक्यं भोः प्रवेष्टुमिह वै त्वय़ा ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति