शान्ति पर्व  अध्याय १४७

शौनक उवाच

केचिदेव महाप्राज्ञाः परिज्ञास्यन्ति कार्यताम् |  २०   क
जानीहि मे कृतं तात व्राह्मणान्प्रति भारत ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति