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वन पर्व
अध्याय ११७
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्चय़ित्वा जामदग्न्यं पूजितस्तेन चाभिभूः |  १८   क
महेन्द्र उष्य तां रात्रिं प्रय़यौ दक्षिणामुखः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति