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वन पर्व
अध्याय २७१
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मार्कण्डेय़ उवाच
तद्दृष्ट्वा व्यथनं कर्म कुम्भकर्णस्य रक्षसः |  ५   क
उदक्रोशन्परित्रस्तास्तारप्रभृतय़स्तदा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति