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वन पर्व
अध्याय १४७
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वैशम्पाय़न उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य वानरेन्द्रस्य धीमतः |  १   क
भीमसेनस्तदा वीरः प्रोवाचामित्रकर्शनः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति