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वन पर्व
अध्याय १४७
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हनूमानु उवाच
क एष हनुमान्नाम सागरो येन लङ्घितः |  १०   क
पृच्छामि त्वा कुरुश्रेष्ठ कथ्यतां यदि शक्यते ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति