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वन पर्व
अध्याय १४७
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रसीद नास्ति मे शक्तिरुत्थातुं जरय़ानघ |  १६   क
ममानुकम्पय़ा त्वेतत्पुच्छमुत्सार्य गम्यताम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति